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37 पर लाल,बाकी शिवपाल’ का मतलब समझने के लिए- पूरी खबर पढ़ें

देवरिया लाइव ■ प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवपाल यादव खुद फिरोजाबाद सीट से चुनाव लड़ेंगे, जहां उनका मुकाबला रामगोपाल के बेटे अक्षय यादव से होना तय माना जा रहा है। शिवपाल ने पहले ही तय कर रखा है कि वो मुलायम की सीट छोड़कर हर सीट पर अपना प्रत्याशी उतारेंगे। यानी उत्तर प्रदेश की बाकी सीटों के अलावा परिवार की सभी सीटों पर भी परिवार के समर्थकों के बीच ही मुकाबला होना तय है। राजनीति के जानकारों की मानें तो शिवपाल की ओर से सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारने का मकसद खुद की जीत से ज्यादा अखिलेश यादव को ‘असफल’ नेता साबित करना है। यह बात सच भी है कि शिवपाल राज्य के बाकी हिस्सों में ज्यादा प्रभाव डाल पाएं या नहीं, यादवों के गढ़ में तो बुआ और बबुआ के लिए मुश्किलें खड़ी कर ही सकते हैं। स्थानीय स्तर पर परिवार के कुछ करीबी नेता ये भी कहते सुने जा रहे हैं कि योजना तो यह लगती है कि ‘हम तो डूबेंगे सनम………तुमको भी…..।’

यादवों के गढ़ में यह बात भी महसूस की जा रही है कि समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं का एक वर्ग एसपी-बीएसपी के तालमेल से खुश नहीं है। मुलायम परिवार के पुश्तैनी गांव सैफई के एक वरिष्ठ समाजवादी पार्टी नेता ने यहां तक कहा है कि यह गठबंधन दो नेताओं (बुआ-बबुआ) के बीच का गठबंधन है, जमीनी कार्यकर्ताओं का नहीं। इस इलाके में आजकल एक नारा बहुत तेजी से लोकप्रिय हो रहा है- ‘सैंतीस(37) पर लाल, बाकी पर शिवपाल’। यानी यादव मतदाता अगर 37 सीटों पर सपा उम्मीदवारों का समर्थन कर भी दें, तो बाकी 43 सीटों पर वह मायावती की पार्टी के बजाय शिवपाल की पार्टी को चुनना ज्यादा पसंद करेंगे। यही कारण है कि समाजवादी पार्टी के जिन नेताओं को टिकट नहीं मिलने की आशंका है, वे शिवपाल की पार्टी या बीजेपी में अपने लिए जुगत भिड़ाने में लगे हैं।

पिछले दो चुनावी आंकड़ों का विश्लेषण

समाजवादी पार्टी,बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के गठबंधन को यूपी में अबकी बार 47 सीटें से ज्यादा मिलने तक का अनुमान जताया जा रहा है, तो उसके पीछे आंकड़ों का गणित है। पिछले दो चुनावों में उत्तर प्रदेश में इनका गठबंधन नहीं था, लिहाजा बीजेपी ने बहुत आसानी से मैदान मार ली थी। मसलन 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को मोदी लहर में यूपी में 42.63 फीसदी वोट मिले थे। जबकि, एसपी को 22.35, बीएसपी को 19.77 और आरएलडी को .86 फीसदी वोट मिले थे। अगर इन तीनों को इकट्ठे जोड़ें तो यह आंकड़ा 48.12% तक पहुंचता है। इसी तरह 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 39.67फीसदी वोट मिले थे। जबकि, बीएसपी को 22.23, एसपी को 21.82 और आरएलडी को 1.78 प्रतिशत। इन तीनों का कुल आंकड़ा 45.83% होता है, जो बीजेपी की राह मुश्किल करता दिख रहा है।

महागठबंधन को यूपी में जो भी बढ़त दिखाई जा रही है, उसके पीछे यही आंकड़े बहुत बड़े आधार का काम कर रहे हैं। लेकिन,अगर इसमें यादवों के वोट बंटे और वो पूरी तरह बीएसपी में ट्रांसफर नहीं हुए, तो यूपी की नई राजनीति क्या गुल खिलाएगी कहना बहुत मुश्किल है।

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